मंगल ग्रह पर चलने वाले रोवर को पृथ्वी से किसी खिलौने की तरह रियल टाइम में जॉयस्टिक से नहीं चलाया जा सकता। पृथ्वी और मंगल के बीच दूरी बहुत अधिक है, इसलिए रेडियो सिग्नल को आने-जाने में कई मिनट लग सकते हैं।
1. वैज्ञानिक पहले योजना बनाते हैं
रोवर की तस्वीरों, सेंसर डेटा और आसपास के भूभाग का अध्ययन करके टीम तय करती है कि रोवर को कहाँ जाना है और कौन-से वैज्ञानिक प्रयोग करने हैं।
2. कमांड रेडियो सिग्नल से भेजे जाते हैं
पृथ्वी पर एंटेना कमांड को रेडियो तरंगों के रूप में अंतरिक्ष यान या सीधे रोवर तक भेजते हैं। सिग्नल को मंगल तक पहुँचने में दूरी के अनुसार कई मिनट लग सकते हैं।
3. ऑर्बिटर संदेश आगे पहुँचा सकते हैं
मंगल की कक्षा में मौजूद कुछ अंतरिक्ष यान रोवर और पृथ्वी के बीच रिले स्टेशन की तरह काम करते हैं। रोवर डेटा ऑर्बिटर को भेज सकता है, जो उसे पृथ्वी तक पहुँचाता है।
4. रोवर कई काम खुद भी करता है
कमांड मिलने के बाद रोवर अपने ऑनबोर्ड कंप्यूटर और सुरक्षा नियमों की मदद से निर्धारित गतिविधियाँ करता है। बाधा दिखने पर वह रुक सकता है या सुरक्षित रास्ता चुनने के लिए अतिरिक्त निर्देशों की प्रतीक्षा कर सकता है।
मुख्य बात: वैज्ञानिक पृथ्वी से निर्देश भेजते हैं, लेकिन दूरी के कारण रोवर को कुछ समय तक खुद काम करने में सक्षम होना पड़ता है।