कार का एयरबैग दुर्घटना के समय पलक झपकते ही खुलता दिखाई देता है। इसके पीछे सेंसर, एक इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट और तेज़ी से गैस भरने वाला इन्फ्लेटर काम करते हैं।
1. सेंसर टक्कर को पहचानते हैं
कार में लगे एक्सेलेरोमीटर और अन्य क्रैश सेंसर अचानक होने वाली गति में बदलाव को मापते हैं। कंट्रोल यूनिट इन संकेतों को देखकर तय करती है कि टक्कर इतनी गंभीर है या नहीं कि एयरबैग खुलना चाहिए। हर छोटे झटके पर एयरबैग नहीं खुलता।
2. कंट्रोल यूनिट तुरंत निर्णय लेती है
यदि सेंसर का डेटा तय मानदंडों से मेल खाता है, तो कंट्रोल यूनिट संबंधित एयरबैग के इन्फ्लेटर को इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजती है। यह निर्णय बहुत कम समय में लिया जाता है।
3. इन्फ्लेटर बैग में गैस भरता है
एयरबैग के डिज़ाइन के अनुसार इन्फ्लेटर गैस बनाने वाली नियंत्रित रासायनिक प्रक्रिया या पहले से संग्रहित दबाव वाली गैस का इस्तेमाल कर सकता है। इसी वजह से मुड़ा हुआ कपड़े का बैग बहुत तेज़ी से फैल जाता है।
4. एयरबैग चोट के जोखिम को कम करने में मदद करता है
फुला हुआ एयरबैग शरीर और कार के कठोर हिस्सों के बीच कुशन जैसा काम करता है। उसमें बने वेंट से गैस बाहर निकलती है, जिससे टक्कर के दौरान बैग शरीर की गति को नियंत्रित करने में मदद करता है।
सीट बेल्ट भी ज़रूरी है
एयरबैग सीट बेल्ट का विकल्प नहीं है। दोनों साथ मिलकर बेहतर सुरक्षा देने के लिए बनाए जाते हैं।
मुख्य बात: सेंसर टक्कर पहचानते हैं, कंट्रोल यूनिट निर्णय लेती है और इन्फ्लेटर बैग में गैस भरता है—यह पूरी प्रक्रिया बेहद तेज़ी से होती है।